"हज़ारों ख़वाहिशें ऐसी कि हर ख़वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।"
मानवीय इच्छाओं के अंतहीन होने और उनकी अतृप्ति का मार्मिक चित्रण।
"बस-कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना।"
यह शेर बताता है कि जीव विज्ञान के रूप में पैदा होना आसान है, लेकिन मानवता के गुणों को अपनाना सबसे कठिन कार्य है।
"न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।"
वजूद और अस्तित्व के दार्शनिक सवाल पर एक गहरी चोट।
"इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।"
जब दुख अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, तो वह खुद ही सुकून बन जाता है—जैसे बूंद का समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देना।