Mirza Ghalib inke shabdon ke gehre Arth

ये मिर्ज़ा ग़ालिब हैं। *मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब* - उर्दू और फ़ारसी के सबसे मशहूर शायर। 1797 में आगरा में पैदा हुए और दिल्ली में रहे। ग़ज़लों में इश्क़, फ़लसफ़ा और ज़िंदगी का दर्द इतनी खूबसूरती से लिखा कि आज भी लोग उन्हें पढ़ते हैं। उनके कुछ मशहूर शेर: _हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले_ _दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है_

Shikha Maurya shikha Maurya

@shikhamaurya272

3 months ago

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​"हज़ारों ख़वाहिशें ऐसी कि हर ख़वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।"
​मानवीय इच्छाओं के अंतहीन होने और उनकी अतृप्ति का मार्मिक चित्रण।
​"बस-कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना।"
​यह शेर बताता है कि जीव विज्ञान के रूप में पैदा होना आसान है, लेकिन मानवता के गुणों को अपनाना सबसे कठिन कार्य है।

​"न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।"
​वजूद और अस्तित्व के दार्शनिक सवाल पर एक गहरी चोट।
"इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।"
​जब दुख अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, तो वह खुद ही सुकून बन जाता है—जैसे बूंद का समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देना।