यह गज़ल उनकी सबसे मशहूर कृतियों में से एक है, जो देशप्रेम और एकता की मिसाल है।
"अगर खिलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है
मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है
हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़बान थोड़ी है
सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है"
यह पंक्तियाँ सोशल मीडिया के दौर में मीम्स के जरिए भी बहुत लोकप्रिय हुईं, लेकिन इनका मूल अर्थ बहुत गहरा और रूमानी है।
"वो गर्दन नापता है नाप ले, पर
मेरी हिम्मत की भी पहचान कर ले
बुलाती है मगर जाने का नहीं
ये दुनिया है इधर जाने का नहीं
मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर
मगर हद से गुज़र जाने का नहीं
ज़मीं भी सर पे रखनी पड़ रही है
मगर ये बोझ घर जाने का नहीं
सितारे नोच कर ले जाऊँगा
खाली हाथ घर जाने का नहीं"
राहत साहब सिर्फ लिखते नहीं थे, बल्कि मुशायरे में जब वो "अमीरों की हवेली पर..." या "किश्ती तेरा नसीब..." जैसी शायरी पढ़ते थे, तो उनका हाथ लहराना और शब्दों पर ज़ोर देना सुनने वालों में जोश भर देता था।
राहत साहब हमेशा सर झुकाकर जीने के खिलाफ थे। उनके इन शेरों में गजब की तपिश है:
"शाखों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे"
"तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो"
मोहब्बत में भी उनकी शायरी में एक अलग तरह की सच्चाई और गहराई दिखती थी:
"आँखों में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
ज़िन्दा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो"
"फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो
इश्क़ खता है तो ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो"
उन्होंने समाज और सियासत के दोहरेपन पर भी जमकर चोट की है:
"बन के इक हादसा बाज़ार में आ जाएगा
जो नहीं होगा वो अख़बार में आ जाएगा"
"नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है"
राहत इंदौरी साहब को 'शायरों का रॉकस्टार' कहा जाता था। उनके बारे में कहा जाता था कि वो मंच पर अकेले ही पूरी फौज के बराबर थे। जब वो कहते थे, "अफ़वाह थी कि मेरी तबीयत खराब है, लोगों ने पूछ-पूछ कर बीमार कर दिया"—तो पूरा मजमा झूम उठता था।