"बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे,
बोल ज़बां अब तक तेरी है।"
"लाज़िम है कि हम भी देखेंगे,
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से, सब बुत उठाए जाएंगे।"
"मुझसे पहली सी मोहब्बत मिरे महबूब न माँग,
मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात।"
"गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले,
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले।"
उनकी कलम की सबसे बड़ी ख़ूबी यही थी कि उन्होंने 'इश्क़' को केवल महबूब तक सीमित न रखकर उसे वतन और मानवता के प्रति समर्पण का नाम दिया।
"निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ,
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले।"
"हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे,
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे।"
"नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं,
क़रीब उन के आने के दिन आ रहे हैं।"
"मकाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं,
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले।"
"दिल ना-उम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है,
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।"
फ़ैज़ की इन पंक्तियों में धैर्य और हिम्मत का एक अद्भुत संतुलन मिलता है।